Wednesday, 17 December 2014

प्रेग्नेंरसी फोबिया क्या है और कैसे पाए इस पर काबू

मां बनने का एहसास शायद इस दुनिया के सबसे खूबसूरत एहसासों में से एक है। प्रेग्नेंसी को हम खुशी के साथ जोड़ते हैं क्योंइकि घर में एक नए महमान के आने से खुशियां दोगुनी हो जाती हैं। इसे टोकोफोबिया के नाम से भी जाना जाता है।
लेकिन कुछ महिलायें प्रसव और उससे पहले के दौर से गुजरने के बाद बहुत डर जाती हैं, इसलिए दोबार से गर्भवती होना भी नहीं चाहती हैं। हालांकि प्रेगनेंसी का यह डर कई महिलाओं में आम होता है और इस डर के पीछे कोई और नहीं बल्कि दिमागी डर छुपा होता है। अगर आप भी प्रेग्‍नेंसी फोबिया से गुजर रहीं रही हैं तो यह टिप्सह आपके काम आ सकते हैं।
काउंसलर से बात करें
गर्भावस्था  बाद अगर आप को डर लग रहा है, प्रसव के बाद होने वाले दर्द से आप उबर नहीं पा रही हैं तो सबसे पहले एक काउंसलर के पास जायें और उससे सलाह लें। काउंसलर के पास इस डर से बाहर निकलने की तरकीबें होंगी जो आपके लिए फायदेमंद हो सकती हैं। उन महिलाओं से भी बात करनी चाहिये जो इस दौर से गुजर चुकी हों।
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पार्टनर का साथ
अगर आपकी महिला साथी किसी भी प्रकार के सदमे से गुजर रही है तो इससे बाहर निकालने का काम उसके पुरुष मित्र का सबसे अधिक है। क्योंहकि वह ही उसकी भावनाओं को समझकर उसे इससे बाहर निकलने में मदद कर सकता है। तो पार्टनर को चाहिए कि अपनी महिला साथी की हर तरह से मदद करें।
सकारात्महक सोच रखें
हर दर्द की दवा है सकारात्मंक सोच, यही सोच आपको हर कदम पर साथ निभाती है। आपको इस पॉजिटिव सोच की ओर भी ध्याचन देना चाहिये कि अगर इस दुनिया में बच्चाह लाना खुशी की बात नहीं होती, तो बहुत से जोड़े यह काम न करते। जब पुराने जमाने में महिलाएं बिना किसी मेडिकल सहायता के प्रसव के दौर से आराम से गुजर जाती थीं, तो आपको तो इतनी सारी मेडिकल सुविधायें उपलब्धक हैं, ऐसे में डर किस बात का।
जानकारी इकट्ठा करें
गर्भावस्थक से लेकर प्रसव तक के बारे में सभी प्रकार की जानकारी इकट्ठा कीजिए। बच्चाब होने से संबधित जानकारी के बारे में बारे में लोगों से पूछने की बजाए अच्छाज होगा कि आप टीवी या फिर अच्छी  किताबों में पढ़ कर जानकारी प्राप्तज करें। आपको तो इस बात से खुश होना चाहिये कि प्रेगनेंसी के समय आप आराम से बिना किसी चिंता के जितनी मर्जी उतनी कैलोरी का खाना खा सकती हैं।
क्योंत होता है टोकोफोबिया
कई महिलाएं प्रसव को लेकर इतनी अधिक डरी होती हैं कि वे 40 तक की उम्र पार होने के बाद भी गर्भवती नहीं होना चाहती हैं। कुछ महिलाएं तो अपनी बॉडी शेप को लेकर ही डर जाती हैं, कि अगर उनका वही सुडौल शेप दुबारा न मिल पाया तो क्याी होगा। कुछ महिलाएं इसलिये डरती हैं कि मां बनने के बाद उनके पार्टनर उन्हें  पहले जैसा प्याहर नहीं करेंगे। कुछ को लगता है कि उनकी जिंदगी में एक नया मेहमान आने से उनकी दिनचर्या प्रभावित हो जायेगी। इसके अलावा महिला को प्रसव के दौरान होने वाला दर्द सबसे अधिक सताता है।
मां बनना एक खूबसूरत एहसास है, और घर में एक नये मेहमान के आने से खुशियां भी बढ़ जाती हैं। इतनी मेडिकल सुविधाओं ने प्रसव के दर्द को कम कर दिया है। तो फिर प्रेग्नें सी फोबिया क्योंड।



Tuesday, 16 December 2014

गर्भवती स्त्रियों के लिए आवश्यक आहार

कैल्शियम 
हम सभी जानते है कि शरीर में कैल्शियम की पर्याप्‍त मात्रा होने पर हड्डियां मजबूत रहती है और दांतों का विकास भी अच्‍छी तरह होता है। अगर गर्भवती महिला के शरीर में कैल्शियम की कमी रहेगी तो बच्‍चे के शरीर में हड्डी और दांतों का विकास अच्‍छी तरह नहीं होगा। इसलिए, प्रेग्‍नेंट वूमन को कैल्शियम से भरपूर साग, सब्‍जी और गोलियों का सेवन अवश्‍य करना चाहिये, ताकि बच्‍चे का विकास अच्‍छी तरह हो और महिला के शरीर में भी कमजोरी न आएं। इसके लिए महिला को हर दिन कम से कम ग्‍लास दूध पीने की आवश्‍यकता है। वैसे चीज़, पनीर और अन्‍य खाद्य सामग्रियां भी कैल्सियम की कमी को पूरा कर सकती हैं।
फॉलिक एसिड सामान्‍यत
हमें पता होता है कि शरीर में फॉलिक एसिड की कमी से छाले पड़ जाते है लेकिन गर्भवती महिला के शरीर में फॉलिक एसिड का उपयोग दूसरा होता है। गर्भवती महिला के शरीर में भरपूर मात्रा में फॉलिक एसिड होने पर बच्‍चे के ब्रेन और रीढ़ की हड्डी का विकास अच्‍छी तरह होता है। गर्भावस्‍था के दौरान गर्भवती महिला को डॉक्‍टरों द्वारा फॉलिक एसिड से भरपूर खाद्य सामग्री खाने के लिए कहा जाता है, इसके अलावा कुछ प्रकार की दवाईयां भी जाती हैं। जानकरी के लिए बता दें कि सोया पनीर, हरी सब्जियों जैसे - पालक, मेथी, लौकी, खरबूज, मूंगफलीआदि में फॉलिक एसिड भरपूर मात्रा में होता है। कई गर्भवती महिलाओं को मूंगफली से एलर्जी होती है, ऐसे में वह इस बात का विशेष ख्‍याल रखें कि वह क्‍या खाएं, जिससे उन्‍हे तकलीफ न हों।

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आयरन  
शरीर में आयरन की भरपूर मात्रा होने पर हीमोग्‍लोबिन का स्‍तर बढ़ जाता है और बच्‍चे के शरीर का विकास अच्‍छी तरह होता है। याद रहें कि गर्भावस्‍था के दौरान खाई जाने वाली हर चीज बच्‍चे के शरीर पर भी बराबर असर करती है, ऐसे में आयरन की मात्रा पर्याप्‍त लेनी चाहिये ताकि बच्‍चा हष्‍ट-पुष्‍ट और स्‍वस्‍थ पैदा हो। बस ध्‍यान रखने योग्‍य बात यह है कि कभी भी कैल्शियम और आयरन वाले फूड को एक साथ न खाएं, क्‍योंकि कैल्शियम में आयरन को अवशोषित वाले स्‍ट्रांग गुण होते हैं। आयरन के लिए ब्रोकली सलाद सबसे बेहतर ऑप्‍शन है।
प्रोटीन
प्रोटीन गर्भावस्‍था के दिनों में शरीर में हर दिन 10 ग्राम प्रोटीन की आवश्‍यकता होती है ताकि बच्‍चा और उसकी मां दोनों की स्‍वस्‍थ रहें। प्रोटीन की पर्याप्‍त मात्रा से शरीर में मांसपेशियां मजबूत होती है और ताकत आती है। अंडे और चिकन में प्रोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। अगर आप शाकाहारी है तो दालें, सोया और अंकुरित चने आदि भी खा सकती हैं, इनमें भी भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।
विटामिन बी12  
गर्भावस्‍था के दिनों में विटामिन बी12 को न लेना सबसे बड़ी भूल होती है। बच्‍चे के दिमागी विकास और प्रॉपर फंक्‍शनिंग के लिए विटामिन बी12 सबसे ज्‍यादा लाभकारी होता है। मुर्गियों और बकरे के मीट में विटामिन बी12 सबसे ज्‍यादा मात्रा में पाया जाता है। अगर आप शाकाहारी है तो स्‍प्राउट बीन्‍स खाएं।
पानी  
शायद इस बात को बताने की आवश्‍यकता नहीं है कि गर्भावस्‍था के दौरान महिला को पर्याप्‍त पानी क्‍यों पीना चाहिये। पानी पीने से न ही शरीर के विषैले तत्‍व पेशाब के रूप में बाहर निकल जाते हैं बल्कि बॉडी डिहाईड्रेट भी नहीं होती है। इससे कई प्रकार के संक्रमण से मां और बच्‍चा बचे रहते है।
फल 
फल, कभी भी कहीं भी मिलते हैं और सबसे ज्‍यादा लाभकारी होते है। आप सभी फलों को एकसाथ काटकर खाएं, यानि फ्रुटसेलेड बनाएं और हल्‍का सा चाट मसाला डालकर खाएं। इससे गर्भवती महिला के मुंह का टेस्‍ट भी चेंज हो जाता है और उसे अच्‍छा भी लगता है। सभी फलों में कुछ खास गुण होते है जो शरीर को स्‍वस्‍थ बनाते है। जैसे - आयरन, फाइबर आदि।

Monday, 15 December 2014

गर्भावस्था में आयरन और कैल्शियम की गोलियां साथ न लें

गर्भावस्था के दौरान आपके तीन जरूरी गोलियों का सेवन करना बहुत आवश्यक होता है वे हैं, फॉलिक एसिड, कैल्शियम और आयरन टैबलेट्स। हालांकि दूसरी तिमाही के बाद फोलिक एसिड की मात्रा को कम किया या रोका जा सकता है। लेकिन प्रसव के बाद भी  आपकी कैल्शियम और आयरन की खुराक को जारी रखने की सलाह दी जाती है। इन तीनो का ही गोलियों का गर्भावस्था के समय अपना-अपना योगदान होता है। लेकिन फिर बात ये आती है कि भला इनकी गोलियों का सेवन किस प्रकार किया जाए? तो चलिये जानें कि प्रेगनेंसी में आयरन और कैल्शियम की जरूरत क्यों है और इन्हें साथ लिया जाना चाहिये या नहीं।
फॉलिक एसिड और आयरन की कमी से गर्भावस्था के दौरान एनीमिया हो सकता है जिस कारण प्लेसेंटा को ठीक प्रकार से ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और गर्भवती महिलाओं को थ्रोम्बोलसिस और ज्यादा ब्लीडिंग हो सकती है। तो चलिये जानें कि प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए कैल्शियम, आयरन व फॉलिक एसिड किस प्रकार लाभदायक है।

गर्भवती महिलाओं के लिए कैल्शियम क्यों है जरूरी
गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को पर्याप्त कैल्शियम की जरूरत होती है, क्योंेकि यह गर्भस्थ शिशु और मां दोनों के लिए आवश्यक होता है। उम्र बढ़ने के साथ भी अतिरिक्त कैल्शियम की जरूरत होती है, जिसकी आपूर्ति करना जरूरी होता है। जब शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं मिलता, तो वह हड्डियों से कैल्शियम लेने लगता है। ऐसा होने पर आहार के माध्यम से कैल्शियम की भरपाई आवश्यक हो जाती है। लेकिन शरीर को कितनी मात्रा में कैल्शियम चाहिए, यह जानना भी आवश्यक है। यदि आप कैल्शियम की गोली ले रही हैं, तो इसे खाली पेट कभी न लें। कुछ लोगों को कैल्शियम रूप में पूरक आहार लेने से पेट में गैस बनने के साथ भूख न लगने की समस्या भी हो सकती है। इसके अलावा मुंह सूखना, बार-बार पेशाब होना, मुंह का स्वाद बिगड़ना, उल्टियां होना, कब्ज तथा पेट दर्द आदि समस्याएं भी हो सकती है। इनमे से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से मिलें।
गर्भवती महिलाओं के लिए आयरन क्यों है जरूरी
यदि खून में हीमोग्लोबिन की कमी हो, तो आयरन की गोलियां खाने की सलाह दी जाती है। महिलाओं को इसकी अधिक जरूरत होती है। आयरन की जरूरत हीमोग्लोगिन बनाने के लिए होती है। यह प्रोटीन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है जो शरीर के विभिन्न अंगों तथा ऊतकों में ऑक्सीजन देने का काम करता है। गर्भावस्था में आपके शरीर को सामान्य से 50 प्रतिशत अधिक रक्त की जरूरत होती है, इसलिए आपकी आयरन की आवश्यकता भी उसी हिसाब से बढ़ जाती है। आहार में आयरन की आवश्यकता के अनुसार मात्रा न होने पर आयरन की कमी या एनीमिया हो सकता है। लेकिन ध्यान रहे कि आयरन की गोली खाली पेट न लें। खाने से आधे घंटे बाद इनका सेवन करें। आयरन सप्लामेंट लेने के साथ-साथ सीट्रस फ्रूट्स जैसे नींबू, नारंगी आदि का सेवन भी करती रहें।
आयरन की कमी से हानि
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के हिसाब से भारत में 65 से 75 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी पायी जाती है। गर्भावस्था के दौरान यह रोग फोलिक एसिड की कमी की वजह से होता है जिसे फोलेट की कमी से होने वाला एनीमिया या हाइपरनिसिस ग्रेविद्रम कहा जाता है। शोध बताते हैं कि गर्भावस्था की पहली दो तिमाहियों में आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से समय से पहले प्रसव और कम वज़न वाले शिशु के जन्म की संभावना बढ़ जाती है।
गर्भवती महिलाओं के लिए फॉलिक एसिड
फॉलिक एसिड (जिसे फॉलेट भी कहा जाता है) आनुवंशिक बीमारियों को लगभग 70 प्रतिशत तक कम करता है। गर्भावस्था के दौरान फॉलिक एसिड बहुत ही आवश्यक होता है। गर्भावस्था के दौरान फॉलिक एसिड का सेवन बच्चों में स्पाइना बिफिडा और दूसरी विसंगतियों को रोकने में मदद करता है। प्राकृतिक तौर पर यह सब्जियों और नाश्ते लायक कुछ दलहनों में भी पाया जाता है। इसके अलावा जिन मछलियों में तेल पाया जाए (जैसे हेरिंग, मकरील, सालमन या सार्डिन), वे भी लाभदायक होती हैं।
साथ न खाएं आयरन की गोली कैल्शियम के साथ
गोलियों को डॉक्टर के द्वारा बताए समय के अनुसार अनुशषन से लें। और हां, आयरन की गोली कैल्शियम के साथ न लें। दोनों के खाने के बीच में कुछ देर का अंतर रखें। आप फॉलिक एसिड को सुबह में या दोपहर के भोजन के साथ ले सकती हैं। आयरन और कैल्शियम की गोलियों के लेने के बीच समय का अंतर रखें। क्योंकि यदि आप कैल्शियन और आयरन को साथ मे लेती हैं तो कैल्शियम शरीर द्वारा आयरन के अवशोषण में हस्तक्षेप करेगा। जिससे कि भ्रूण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। तो इस सभी गोलियों, बिना किसी समस्या पूरा लाभ लेने के लिए, इन्हें लेने के समय के बीच अंतर बनाए रखें।

Friday, 12 December 2014

जन्म के ये 3 महीने बच्चों के लिए होते हैं महत्वपूर्ण

बच्चे के जन्म से ठीक पहले और बाद का वक्त उसके विकास और भविष्य के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होता है। रिसर्च ये साबित कर चुकी है कि एक माँ के तनाव के स्तर से लेकर धूम्रपान, कीटनाशकों और पालतू जानवरों की रूसी तक सब कुछ ऐसा है जो बच्चे के बीमारी के जोखिम को बड़ा सकता है। इनका असर बच्चे की पूरी ज़िंदगी तक बना रह सकता है। लेकिन एक और चीज़ है जिसके बारे में आपने नहीं सोचा होगा कि उसका बच्चे की सेहत पर असर पड़ सकता है : वो महीना जिसमें बच्चे का जन्म होता है- या कुछ मामलों में, जिस महीने में गर्भ धारण किया जाता है। हाल में हुई काफी सारी स्टडीज ने एक बच्चे के जन्म के लिए दिलचस्प सहसंबंध और संभावित निहितार्थ को खोज निकाला है। यहां कुछ हैरान करने वाली खोज के बारे में जिक्र किया जा रहा है।
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गर्भावस्था
मई से जुड़ी धारणाएं और समय से पहले जन्म प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी के सेंटर ऑफ हेल्थ एंड वेलबीइंग के पीएडी, अर्थशास्त्री हैन्स शॉन्ट और उनके सह-लेखक जैनेट कुरी की 2013 में की गई एक स्टडी के अनुसार, मई के महीने में गर्भधारण करने वाली महिलाओं की समय से पहले डिलीवरी का अन्य महिला से 10 प्रतिशत ज्यादा जोखिम होता है। रिसर्चरों ने ये अंदाज़ा लगाया कि जनवरी और फरवरी में इन्फ्लूएंजा की उच्च दर इसमें भूमिका निभा सकती है, क्योंकि ये ज्ञात हो चुका है कि फ्लू की पकड़ में आने से माँ को प्रीमैच्योर दर्द उठ सकता है।
लेकिन इससे मई का महीना गर्भाधान के लिए खराब नहीं हो जाता है। शॉन्ट कहते हैं, "कुछ सालों में, फ्लू का मौसम पहले आने लगेगा। इसका मतलब वो महिलाएं जो शुरूआती महीनों में गर्भाधान करेंगे उनका जोखिम अधिक बढ़ जाएगा।" इसके बावजूद गर्भवती महिला को फ्लू शॉट देने से वह और उसका बच्चा अभी या भविष्य में होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों से सुरक्षा पा सकता है।
पतझड़ के मौसम में जन्म और शारीरिक फिटनेस स्पोर्ट्स मेडीसन के इंटरनेशनल जर्नल में 2014 में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार नवंबर महीने में पैदा हुआ बच्चा अपनी ही उम्र के अप्रैल महीने में पैदा हुए बच्चे से कम से कम 10 प्रतिशत तेज़ भाग सकता है. 12 प्रतिशत ऊंची छलांग लगा सकता है और 15 प्रतिशत अधिक शक्तिशाली होता है। पतझड़ के महीने में पैदा होने वाले बच्चे साल के अन्य महीनों में पैदा हुए बच्चों से अधिक प्राकृतिक रूप से फिट होते हैं।
इसका संभावित कारण लेखक ये बताते हैं कि वे महिलाएं जो गर्मियों में गर्भधारण करती हैं, उन्हें सूर्य का पर्याप्त प्रकाश मिलता है। इसलिए वो अधिक विटामिन डी पैदा करती हैं, जो कि भ्रूण के विकास के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है।
वसन्त ऋतु के बच्चे और मल्टिपल स्क्लेरोसिस गर्भ में विकास के दौरान विटामिन डी का निम्न स्तर भी बच्चे के लिए मल्टिपल स्क्लेरोसिस होने का जोखिम बढ़ा सकता है। ये खतरा बाद के जीवन के लिए होता है।
क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन की एक स्टडी ने पाया कि मई महीने में पैदा हुए बच्चे के अंदर नवंबर के महीने में पैदा हुए बच्चे से 20 प्रतिशत कम विटामिन डी पाया जाता है। इससे शरीर का अपना इम्यून सिस्टम भी कमज़ोर हो जाता है।
पुरानी रिसर्च भी बताती हैं कि मई के महीने में पैदा हुए बच्चों में मल्टिपल स्क्लेरोसिस का खतरा सबसे अधिक होता है और नवंबर के महीने में पैदा हुए बच्चों में सबसे कम। रिसर्चर बताते हैं कि इसका कारण "सनशाइन विटामिन" हो सकता है।
इन सब के बावजूद, अगर आप मई महीने में गर्भाधान करती हैं तो डरे नहीं, या अगर आप नवंबर महीने में गर्भाधान करती हैं तो अपने बच्चे को ऑलम्पिक्स का खिलाड़ी बनाने के सपने न देखने लगें। बच्चे की सेहत पर समय का पड़ने वाला कोई भी प्रभाव इतना महत्वपूर्ण भी नहीं है कि आप गर्भावस्था के दौरान अच्छे खानपान, धूम्रपान और शराब से बचकर और नियमित रूप से व्यायाम करके उससे पार न पा सकें। शॉन्ट कहते हैं, "अगर आपकी कोई निजी वरीयता नहीं है, तो गर्भधारण या बच्चे को जन्म देने का कोई सबसे अच्छा या बुरा महीना नहीं होता।"

सांस के व्यायाम से गर्भावस्था में लाभ


गर्भावस्था  के दौरान अगर मां फिट रहेगी तो बच्चां भी स्वीस्थ  रहेगा, इसके लिए जरूरी है गर्भावस्था  के दौरान व्या याम किया जाये। गर्भावस्थाभ के दौरान प्रत्ये़क
महिला को सांस संबंधित व्याायाम जरूर करना चाहिए। यह बच्चें के पूर्ण विकास के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि सांस के व्याायाम करने से बच्चे  को पर्याप्ते मात्रा
में आक्सीतजन मिलती है और सांसों की बीमारियां भी नहीं होती हैं। इस लेख में जानिये कि गर्भावस्था  के दौरान सांसों के कौन-कौन से व्यांयाम करने चाहिए।

पेट से सांस लेना
पेट से सांस लेने को बैली ब्रीदिंग भी कहते हैं। इसे करने के लिए पैरों को मोड़कर आरामदायक मुद्रा में बैठिये, जबड़ों, कन्धों और नितम्बों समेत अपने पूरे शरीर को
ढीला छोड़ दीजिए। एक हाथ अपने पेट पर रखें और दूसरा इसके ऊपर। निचले हिस्से से गहरी सांस लीजिए और पेट को हवा से भरकर 8 या उससे अधिक गिनती गिनें।
धीरे-धीरे सांसों को छोड़ें। इस व्याियाम को रोज 10 मिनट तक करें। पेट अधिक बढ़ जाने पर घुटनों पर हाथ रखकर भी इसे कर सकती हैं।
सीने से सांस लेना
इसे करने के लिए सीधे खड़े हो जाइये और अपने पैर एक-दूसरे के सामानांतर रखिये। मुह बंद रखें और 10 तक गिनते हुए गहरी सांस लीजिए। हाथों को छाती पर रखें,
लेकिन ध्यान रखें इन्हेंो जोर से दबायें नहीं। सांस लेते हुए फेफड़े फूलने के साथ ही अपने हाथों को फैलायें। फिर आराम से सांसों को छोड़ें, जितना समय सांस लेने में
लगाया उतना ही सांस छोड़ने में लगायें। इस व्यायाम को 10 बार कीजिए। गर्भावस्थां के सातवें महीने में इसे करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए इस वक्तछ इसे
आराम से ही करें।
शैलो ब्रीदिंग
इसे उथले सांस लेना कहते हैं, इसे कुछ मिनटों के लिए ही करना बेहतर है। इसे करने के लिए घुटनों को मोड़ते हुए पीछे की ओर झुकें और पैरों को सामानांतर रखते हुए
सीधे खड़े हों जायें। इसके बाद अपना मुह पूरा खोलें और जल्दीऔ-जल्दीा सांसें लीजिए, यह फेफड़ों के लिए अच्छाी व्या याम है। दिन में कम से कम पांच मिनट के
लिए यह व्याकयाम करें।
वैकल्पिक रूप से गहरी सांस लेना
इसे करने के लिए आरामयक स्थिति में बैठ जाएं या पैरों को मोड़कर बैठें या फिर पैरों को सीधा रखकर खड़े रहें। जबड़े, हाथ, घुटने, नितम्ब और कन्धों समेत पूरे शरीर
को ढीला छोड़ दीजिए। इसके बाद गहरी सांस लें और कुछ सेकण्ड्स के लिए इस स्थिति में रहें। धीरे-धीरे इसे छोड़ें। फिर अपना मुंह चौड़ा खोलें और पांच तक गिनते हुए
हवा अंदर खीचें।
गर्भावस्थार में व्याखयाम के साथ-साथ खानपान का विशेष ध्या।न रखें और नियमिोत रूप से चिकित्स्क के पास जाकर जांच अवश्यस करायें।

Wednesday, 10 December 2014

साप्ताहिक भ्रूण विकास की जानकारी

गर्भावस्था के शुरुआती अवस्था में भ्रूण का विकास जानने के लिए डॉक्टर अल्ट्रासाउंड का सहारा लेती हैं। इसी के जरिए वे देखती हैं कि भ्रूण ठीक से विकास कर रहा है या नहीं।
हर प्रेगनेंसी अलग होती है और इसी तरह हर फेटल का विकास भी अलग होता है इसलिए अपनी स्टेज को बिल्कुल एग्ज़ॅक्ट ऐसा ना समझें, यह पंद्रह दिन उपर या पंद्रह दिन कम तक हो सकता है इसीलिए अपनी प्रेगनेंसी को पिनपायंट करने से पहले पंद्रह दिन का गेप ले के चलें ! आइडिली प्रेगनेंसी पहले दिन से आख़िरी मेन्स्ट्रुयल साइकल तक होती है लेकिन ओव्युलेशन तीसरे वीक मे होता है इसलिए हम प्रेगनेंसी का रिकॉर्ड तीसरे वीक से रखते हैं !
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पहला साप्ताह:आपकी मेन्स रूअल साइकिल की शुरूवात के लगभग 14 दिनों बाद ओवुलेशन के समय शुरू होता है । यह समय गर्भावस्था के लिए एक अच्छी  शुरुआत करने के लिए अच्छा होता है । आपको व्याययाम, फॉलिक एसिड के आहार और गहरे रंग के फल व सब्जि़यां खाना शुरू कर देना चाहिए । अब धूम्रपान व अल्कोहल को ना कहने का समय आ गया है । अगर आप दवाएं ले रही हैं तो अपनी गायनाकालाजिस्टक से इस विषय में बातें करें ।
दूसरा साप्ताह:आपकी ओवरी से अण्डों के बाहर आने का समय आ गया है। अगर आपको जुड़वा बच्चे होने की सम्भावना होगी तो इस समय दो अण्डे बाहर आते हैं या कुछ स्थितियों में तीन अण्डे  बाहर आते हैं ।
तीसरा साप्ताह- एक औरत तकरीबन तीन हफ्ते बाद अपनी आख़िरी मेन्स्ट्रुयल साइकल के पहले दिन ओव्युलेट करती है उसकी ओवरी से एक अंडा निकल कर फेलोपियन ट्यूब्स से होते हुए यूटरस मे चला जाता है अगर इंटरकोर्स ओव्युलेशन पीरियड मे किया जाए तो प्रेगनेंट होने के चान्स अधिक होते हैं इंटरकोर्स के दौरान आपके पार्टनर के शरीर से लाखों स्पर्म निकलते हैं लेकिन उनमे से कोई एक इस रेस को जीतता है और अंडे को फर्टिलाइज़ करता है इस दौरान बेबी एक सेल क्लस्टर होता है जो आने वाले दिनों मे गुणात्मक रूप मे बढ़ता है।
चौथा साप्ताह- इस दौरान अधिकतर औरतें अपने शरीर मे कोई बदलाव महसूस नही करती हैं कुछ महिलाओं को इस समय टेस्ट बदलाव होने की शिकायत होती है अब फर्टिलाइज़्ड अंडा यूटरस तक पहुँच जाता है और तकरीबन बहत्तर घंटो के बाद यह अपने लिए यूटरस लिनिंग मे जगह बना लेता है यूटरस लिनिंग की रक्त कोशिकाएं अंडे को स्पर्श करती हैं और अंडा बढ़ने की शुरुआत कर देता है !
पाँचवा साप्ताह- इस समय ज़्यादातर महिलाओं को लगने लगता है की वह प्रेगनेंट हैं क्योंकि इतने दिनों तक पीरियड्स ना होना इसका संकेत दे देता है साथ ही स्तनों पर सूजन तथा स्तन के आस पास के हिस्से पर ब्राउन दाग पड़ने से उसका रंग गहरा हो जाता है मूत्र करने मे ज़्यादा ज़ोर लगता है इस समय तक अंडा २० मिलीमीटर तक बढ़ चुका होता है और उसे एंब्रीयो कहते हैं अल्ट्रासाउंड की मदद से यह देखा जा सकता है अब बच्चे का दिमाग़ और स्पाइन बनने शुरू हो जाते हैं।
छटा साप्ताह- इस हफ्ते के दौरान प्रेगनेंट महिलाओं को सुबह के समय उठने मे काफ़ी दिक्कत होती है और काफ़ी समय तक तबीयत नासाज़ रहती है यह भी हो सकता है कि इस तरह की फीलिंग वह पूरे दिन महसूस करें ! आपकी सूंघने की शक्ति कमज़ोर पड़ने लगती है यहाँ तक कि कुछ खुश्बुओं को सूंघने के लिए आपको काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ता है इस समय अगर आपका डॉक्टर आपका वेजाइनल टेस्ट करे तो इस दौर मे उसका रंग गुलाबी से हल्का नीला हो जाता है इस अवस्था मे अगर यूरिन टेस्ट किया जाए तो प्रेगनेंसी को कन्फर्म किया जा सकता है अब तक अंडा लगभग एक मौसमी के आकर का हो चुका होता है अल्ट्रासाउंड से गौर से देखा जाए तो अबतक बच्चे का सिर तथा स्पाइन बन चुकी होती है साथ ही उसका चेहरा और जबड़ों का विकास शुरू हो चुका होता है !
सातवाँ साप्ताह- प्रेगनेंसी हॉर्मोन्स एक महिला को कमज़ोर बना देते हैं साथ ही ब्रेस्ट मे भारीपन और सूजन महसूस होने लगती है प्रेग्नेन्सी कन्फर्म करने के लिए वेजाइनल टेस्ट किया जा सकता है अब तक बेबी की लिंब बड्स आ चुकी होती हैं जो उसके हाथ पैर बनने का संकेत देती हैं इस हफ्ते तक बच्चे का दिमाग़ तथा स्पाइन तकरीबन पूरी तरह तैयार हो चुकी होती है और बच्चा अब तक एक से तीन सेंटीमीटर तक बड़ा हो चुका होता है !
आठवाँ साप्ताह- आठवे हफ्ते मे वेजाइनल डिसचार्ज बढ़ जाता है लेकिन यह बहुत ही सामान्य और दुर्गंध रहित होता है हालाँकि इस समय तक बच्चे की इंटर्नल ऑर्गन्स बन चुकी होती हैं लेकिन अभी उन्हे कम करने के लिए और विकास की आवश्यकता होती है बच्चे की आँखें और कान पूरी तरह विज़िबल हो जाते हैं और उसका चेहरा भी इंसानी शक्ल लेने लगता है, अबतक बच्चा दो से पाँच सेंटीमीटर तक लंबा हो चुका है।

Tuesday, 9 December 2014

स्त्रीके लिए गर्भावस्था की जानकारी

गर्भवती होने से पहले जानकारी
गर्भावस्था अपने आप में एक मुश्किल घड़ी है। गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान कई उतार-चढाव के दौर से गुजरते हुए खट्टे-मीठे अनुभवों को महसूस करती है।
गर्भावस्था में न सिर्फ महिला में शारीरिक बदलाव आते हैं बल्कि मानसिक बदलाव आना भी जायज है। इसीलिए महिलाओं को गर्भवती होने से पहले यानी गर्भ के पहले उन तमाम जानकारियों का पता होना चाहिए जो गर्भावस्था के दौरान काम आने योग्य है, क्योंकि सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चि‍त करना हर महिला का अधिकार है। आइए जानें,गर्भवती होने से पहले किस तरह की जानकारियां होना आवश्यक है।
  • हर मां एक स्वस्थ और हेल्दी बच्चे को जन्म देना चाहती है। लेकिन उसके लिए कुछ प्रयास करना भी आवश्यक होता है।
  • महिला को गर्भावस्था से पहले अपने आपको मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करना जरूरी होता है व आने वाली जिम्मेदारियों को निभानेके लिए तैयार होना भी बहुत जरूरी है।
  • गर्भधारण से पहले महिलाओं को अपने वजन पर खासा ध्यान देना चाहिए। इतना ही नहीं महिला को अपने स्वास्थाय पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • गर्भधारण से पहले जरूरी है कि महिलाएं शारीरिक रूप से फिट हो यानी वो गर्भावस्था के दौरान होने वाली पीड़ा को उठाने के लिए सक्षम हों।
  • गर्भावस्था से पहले बहुत अधिक वजन माँ और बच्चे दोनों के लिए खतरा बन सकता है। यदि मोटी महिलाएं गर्भधारण से पहले अपना कुछ वजन कम कर लें तो वे स्वस्थ रूप से गर्भधारण कर पाएंगी अन्यथा उन्हें गर्भपात का या अन्य खतरा हो सकता है।
  • बहुत कम उम्र यानी 20 से कम उम्र में गर्भधारण मां और होने वाले बच्चे दोनों के लिए ही खतरनाक होता है।
  • महिलाओं में गर्भधारण की उम्र 35 से कम होनी चाहिए। इससे भविष्य में होने वाले खतरों और गर्भपात की संभावना से बचा जा सकता है।
  • बच्चें की देखभाल और रखरखाव के बारे में पहले से ही सही जानकारी लेना गर्भवती महिला को स्वास्य्े   संकट से बचाता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के लिए गर्भावस्था से संबंधित कुछ किताबों को पढ़ना अच्छा रहता है क्योंकि यह आत्मवविश्वास बढ़ाने में सहायक हैं।
  • डायबिटीज या हार्ट डिजीज जैसी बीमारियां आजकल आम हो गई हैं, ऐसे में जरूरी है कि आप समय-समय पर अपना रूटीन चेकअप करवाएं।
  • डायबिटीज होने पर शुगर को नियंत्रित रखें और अपनी डाइट में परिवर्तन करें। शुगर फ्री खाघ पदार्थों को अधिक प्राथमिकता दें।
  • अपना ब्लड प्रेशर नियंत्रि‍त करें। इससे आपको गर्भावस्था के दौरान कम परेशानी होगी।
  • आप अपनी डाइट में फोलिड एसिड, विटामिन, प्रोटीन और कैलोरी की मात्रा को बढ़ा दें और लगातार डॉक्टर के संपर्क में रहें।
  • एचआईवी एड्स, एण्ड्रीयोमेट्रोयोसिस और यौन विकार संबंधी रोगों से संबंधित चेकअप गर्भधारण से पहले ही करवा लेने चाहिए। इससे होने वाले बच्चे और मां को भविष्य में किसी भी तरह के खतरे की संभावनाएं कम होती है।
  • गर्धारण से पहले यदि महिला किसी रोग से संक्रमित है तो उसका पूरा इलाज करवाएं और गर्भधारण से पहले डॉक्टर की सलाह लेना न भूलें। सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि पुरूषों पर भी यही बात लागू होती है।
  • गर्भधारण से पहले कुछ खास बातों को ध्यान में रखकर ही आप स्वस्थ रूप से गर्भधारण कर पाएंगी और हेल्दी बच्चे को जन्म देने में सफल होंगी।